झारखंड में कोयला चोरी के साथ-साथ पनपता जा रहा है अवैध वसूली (टैरर फंडिंग) रंगदारी का खेल.
कोल परियोजना से जुड़े विस्थापित भोले भाले ग्रामीण बेरोजगार नॉजवानो को बहकाकर करवाया जाता है कोयला वाहनों से प्रति ट्रक 3 से 4 हजार रुपये का अवैध वसूली.
वसूली की गई रकम से मैनेज होता है पूरा वसूली सिंडिकेट..लेकिन जब कार्यवाही की नोबत आती है तो सिर्फ भोले भाले ग्रामीणों को ही टैरर फंडिंग में फसाया जाता है👉विस्थापित ग्रामीण
झारखंड के चतरा और हजारीबाग जिले की सीमा पर संचालित चंद्रगुप्त कोल परियोजना में उग्रवाद और भ्रष्टाचार का बड़ा खेल सामने आ रहा है। उत्खनन में लगी शुशी इंफ्रा कंपनी शुरू होने के महज एक महीने के भीतर ही कोल डंप में भय का माहौल बनाकर अवैध वसूली का धंधा शुरू हो चुका है। केरेडारी क्षेत्र में उग्रवादियों, स्थानीय कमेटियों, सफेदपोश नेताओं और जनप्रतिनिधियों का एक खौफनाक गठजोड़ तैयार हुआ है। कोल डंप पर डरा-धमकाकर प्रति ट्रक ₹3,000 (3 हजार रुपये) की मोटी रकम वसूली जा रही है। जिसकी भनक प्रशासन से लेकर केंद्रीय जाँच एजेंसियों तक मिल चुकी है। हालांकि अभी तक इसपर कोई कार्यवाही नही हुई है।
सीसीएल कि चन्द्रगुप्त कोल परियोजना में आखिर किसके इशारे पर चल रहा है टैरर फंडिंग पार्ट -2 ?
केंद्रीय जाँच एजेंसी एनआईए के कार्यवाई से बैखोफ होकर सीसीएल की चन्द्रगुप्त परियोजना में सफेदपोश और अधिकारियों की मिलीभगत से भोले भाले बेरोजगार ग्रामीण युवाओं को बहकाकर प्रति ट्रक तीन से चार हजार रुपये का वसूली करवाया जा रहा है। हालांकि अवैध वसूली (टैरर फंडिंग) कि रकम छोटे बड़े सभी साहब के टेबल तक भी पहुँचाये जाने की सूचना है। विस्थापित ग्रामीण युवाओं को मोहरा बनाकर कौन है इस टैरर फंडिंग खेल के पीछे इसका खुलासा भी जल्द होगा….
वहीं चन्द्रगुप्त परियोजना से विस्थापित रैयत रितेश कुमार ने मीडिया को बताया कि अवैध कमिटी-उग्रवादियों, नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत से प्रति ट्रक तीन से चार हज़ार रुपये अवैध वसूली हो रहा है।
वहीं कोयले की खुदाई कर रहे,शुशी इंफ्रा कंपनी पर विस्थापित रैयत जीवन दास ने टेरर फंडिंग को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा है आउटसोर्सिंग कोयला खनन कम्पनी रैयतों के उपजाऊ जमीन में कोयला खनन करने के बदले उन्हें नॉकरी देने के बजाय, उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करके गुंडा टैक्स टैरर फंडिंग वसूली करने में सह दे रही है।
टेरर फंडिंग का खतरा: लोडिंग के नाम पर वसूली जा रही इस लेवी का सीधा फायदा उग्रवादी संगठनों तक पहुचने की खबर, जिससे इलाके में फिर से टेरर फंडिंग का जाल मजबूत हो रहा है।
गौरतलब है कि इससे पहले भी चतरा और आसपास की कोल परियोजनाओं में रंगदारी और लेवी के मामलों की जांच नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी जैसी केंद्रीय एजेंसियां कर चुकी हैं और कई बड़े चेहरे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचे हैं। इसके बावजूद चंद्रगुप्त प्रोजेक्ट में बेखौफ जारी इस वसूली ने प्रशासन के दावों की पोल खोल दी है
। अब स्थानीय लोगों और ट्रांसपोर्टरों ने इस पूरे सिंडिकेट पर एनआईए से जांच कराने की मांग तेज कर दी है।