

*झारखंड में संचालित कोल परियोजनाओं में बड़का साहब कि कमीशनखोरी, अनगिनत टेबुल खर्च, फिक्स महीना वसूली, और अब कोयला ट्रांसपोर्टिंग में प्रति टन टना टन वसूली का फरमान से त्राहिमाम कर रहे हैं कोयला ट्रांसपोर्टर व्यवसायिक वर्ग।*
*साहब का मोह बड़ा हो रहा है..महीने के फिक्स रकम से कुछ नही होगा कोयला ढुलाई में प्रति टन देना होगा।*
*जी हाँ हम बात कर रहे हैं झारखंड राज्य में संचालित कोयले की परियोजनाओं की जहां कोयला व्यवसायियों को अब कोयला का व्यवसाय करना घाटे का सौदा महसूस हो रहा है।*
*जहाँ एक तरफ केंद्रीय जाँच एजेंसियों द्वारा लगातार नक्सलियों और टेरर फंडिंग पर लगाम लगाने से कोयला व्यवसायियों को नक्सल टेरर फंडिंग से राहत मिली है, वही दूसरी तरफ अब साहब को फिक्स महीना वसूली के जगह अब प्रति टन देने का फरमान कोयला व्यवसायियों को डर और भारी नुकसान का कारण बन रहा है।*
*लगातार टेबल और साहब का मोह माया बढ़ने से कोयला व्यवसायी कोयले की खरीद बिक्रि कम कर दिए हैं। जिससे कोल इंडिया के द्वारा कोयला ऑक्सन में व्यापारी कुल ऑक्सन का 20% कोयला भी नही खरीद रहे हैं।*
*सूत्र बताते है कि संचालित कोल परियोजनाओं में अवैध खनन और कोयला चोरी में लगाम लगाने के बजाय बड़का साहब, कोल व्यवसायियों से आरसीआर, लोकल सेल,सरकारी कोयला ट्रांसपोर्टिंग के कार्य मे प्रति टन वसूली देने का दबाब बना रहे हैं। और सिर्फ दबाब ही नही बना रहे हैं, बड़े साहब अपने कार्य क्षेत्र की मर्यादा को लांघते हुए कोल व्यवसायियों के वाहनों को रात के अंधेरे में या दिनदहाड़े भी रंगदारी पूर्वक रोकथाम करके घंटो ट्रांसपोर्टिंग के कार्य को बाधित करवा रहे हैं। जिससे अब कोल व्यवसायियों को बड़का साहब का यह रवैया नागवार गुजर रहा है। वहीं कोल व्यवसायिक वर्ग कहता है कि उनका भी परिवार है वह अपनी गाढ़ी कमाई लगाकर या लोन उधार पैसा लेकर व्यवसाय करते हैं, ऐसे में जब उन्हें खुद मुनाफा नही होगा तो वे इतना रिस्क लेकर कोयला का व्यसाय क्यों करेंगे। जिसका खामियाजा कोल इंडिया को भी उठाना पर रहा रहा है। लगातार कोयला ऑक्सन बिडिंग से कोल व्यापारी दूरी बना रहे हैं।*
*सूत्र:- कोयला व्यवसायिक वर्ग का कहना है कि बाजार में पहले से ही इतना कम्पटीशन है कि व्यापार बचाये रखने के लिए एसटीमिट मूल्य से 20-25% कम मूल्य में कोयला ट्रांसपोर्टिंग कार्य लेना पड़ता है, उसके बाद कार्य शुरू करने से पहले अनगिनत टेबुल खर्च, महीना वसूली फिक्स होने के बाद ही कार्य प्रारंभ होता है। लेकिन साहब का कोयला ट्रांसपोर्टिंग कार्य मे प्रति टन का डिमांड नागवार गुजर रहा है।*
*वहीं झारखंड में कोयला चोरी भी एक गंभीर समस्या है, जिसमें स्थानीय प्रशासन, पुलिस और कोल कंपनियों (BCCL/CCL) के निचले स्तर के कर्मचारियों की संदिग्ध भूमिका और मिलीभगत अक्सर उजागर होती रही है।*
*हालाँकि, कई कोल परियोजना क्षेत्रों में जिला प्रशासन और CISF समय-समय पर अवैध कोयला चोरी पर लगाम लगाने के लिए छापेमारी कर इसे रोकने के प्रयास भी करते हैं।*
*झारखंड में कोयला चोरी में प्रशासन की भूमिका के प्रमुख*👉 बिंदु:
मिलीभगत और निष्क्रियता: कई मामलों में स्थानीय पुलिस और प्रशासन के अधिकारी कोयला माफियाओं को संरक्षण देते हैं, जिसके कारण खुलेआम अवैध खनन और परिवहन होता है।
निगरानी की कमी: कोयला क्षेत्रों में, माफिया प्रशासन की नजरों से बचकर या मिलीभगत से प्रतिदिन लाखों के कोयले की चोरी करते हैं।
कार्रवाई में ढिलाई: रिपोर्टों के अनुसार, पुलिस कार्रवाई में अक्सर केवल गरीब स्थानीय लोगों (कोयला बीनने वालों) को निशाना बनाया जाता है, जबकि मुख्य तस्कर बच जाते हैं।
ईडी और उच्च-स्तरीय जांच: कोयला चोरी की जांच में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने 100 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की है, जो संगठित अपराध में शामिल माफिया-प्रशासन गठजोड़ को दर्शाता है।
कुल मिलाकर, प्रशासन की भूमिका जटिल है—जहाँ एक ओर कड़े निर्देशों के तहत अवैध कोयला ढुलाई चोरी को रोकने का प्रयास होता है, वहीं स्थानीय स्तर पर मिलीभगत की शिकायतें इसे निरंतर बनाए रखती हैं।
बहरहाल यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्रीय जांच एजेंसिया, प्रवर्तन निदेशालय (ED) जब टेरर फंडिंग, अवैध कोयला खनन पर दबिश कर रही है तो ऐसे में बड़का साहब निर्भीक होकर कोयला व्यवसायियों से कोयला ढुलाई में प्रति टन वसूली की मांग किसके इशारे पर करते हैं ?