खूनी सड़क ………

*खूनी सड़क*….चतरा सिमरिया टंडवा मुख्य मार्ग पर हजारों की तादात में कोल वाहनों के अवैध तरिके से जमावाड़ा लगने और बेपरवाह परिचालन होने के कारण, प्रतिदिन स्थानीय निवासियों को सड़क दुर्घटना में अपने परिजनों को तड़प- तड़प कर मरते हुए देखने को मजबूर और लाचार होना पड़ रहा है। हालात तो ये है कि चतरा जिला प्रशासन मौन होकर तमाशबीन बनकर लगातार हो रहे सड़क दुर्घटना में दर्दनाक मौत के मंजर को देख रहा है। लेकिन दुर्घटना पर अंकुश कैसे लगाया जाए, कैसे कोल ट्रांसपोटिंग वाहनों के परिचालन के लिए अलग सड़क बनाई जाए या सड़क का चौड़ीकरण कैसे करवाया जाए, उसपर कोई ठोस पहल करता चतरा जिला प्रशासन दिखाई नही दे रहा है।

आपको जानकर हैरानी होगी कि चतरा जिले में दर्जनों कोल परियोजनाओं की भरमार है, जहाँ से डीएमएफटी फण्ड, सीएसआर फण्ड, का अरबों रूपया जिला प्रशासन को मिलता है, उसके बावजूद जिला सरकारी अस्पताल से लेकर प्रखंड स्तरीय अस्पतालों में चिकित्सक और चिकित्सा व्यवस्था के नाम पर सिर्फ खाना पूर्ति है। आमूनन स्टडी से यह भी पता चलता है कि इन क्षेत्रों में सड़क दुर्घटना के कई केस ऐसे भी थे जिसमे रोड एक्सीडेंट में घायल व्यक्तियोँ को नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र टंडवा, सिमरिया, चतरा भी परिवारजन समय रहते लेकर गए, लेकिन वहाँ जाने के बाद भी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर हर केस में बिना प्राथमिक उपचार किये सिर्फ एक सुई लगाकर हजारीबाग या राँची रेफर कर देते हैं, जिसमे प्राथमिक उपचार के अभाव में पीड़ित बीच रास्ते मे दम तोड़ देता है।

जिसका एक सटीक और आँखों देखी उदाहरण कल का है जहाँ टंडवा सिमरिया मार्ग लकराही मोड़ के समीप हाइवा के चकमा देने से, दोपहिया वाहन और पिकअप वेन में जोरदार टक्कर हो जाती है, जिसमे बड़कागांव थाना क्षेत्र अंतर्गत उरुब गाँव निवासी 25 वर्षीय अजीत नामक युवक बुरी तरह घायल अवस्था मे घंटो सड़क किनारे पड़ा रहता है। जब मैं वहाँ पहुँचता हूँ तो उसको जीवित देखकर एम्बुलेंस को फोन करता हूँ , लेकिन एम्बुलेंस समय पर नही आने के कारण, वहीं के स्थानीय युवक नवीन कुमार के सहयोग से, खून से लतपत घायल युवक को अपने ऑल्टो गाड़ी में पीछे लिटाकर नजदीकी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र टंडवा लेकर जाते हैं। हॉस्पिटल पहुँचते ही वहाँ का मंजर और भी भयावह था , टंडवा सरकारी अस्पताल के उतने बड़े बिल्डिंग में सिर्फ 2-3 नर्स नजर आ रही थी। कोई मेल कंपाउंडर नही था, मेरे ऑल्टो गाड़ी से कोई भी घायल को उतारने को तैयार नही था , डॉक्टर का खोजबीन करने पर एक डॉक्टर साहब आते हैं और घायल युवक का प्राथमिक इलाज करने के बजाय मेरे से ही इन्वेस्टिगेशन और बहस करने लगते हैं। मैं बार- बार डॉक्टर साहब को बोलता हूँ कि आप पहले इसका प्राथमिक उपचार किजिये, आपको जो भी पूछना है में आपके सभी प्रश्नों का उत्तर इलाज के बाद जरूर दूंगा, मेरे बार- बार आग्रह करने पर डॉक्टर साहब प्राथमिक उपचार के नाम पर खाना पूर्ति करते हैं और सिर्फ एक आधा अधूरा इंजेक्सन लगाकर घायल अजित को हजारीबाग सदर अस्पताल रेफर कर देते हैं। मुझे अभी भी याद है ओ मंजर जब अजित खून से लतपत होकर भी चिल्ला- चिल्ला कर बोल रहा था, मेरा पेट मे दर्द हो रहा है लेकिन भगवान का रूप कहे जाने वाले डॉक्टर साहब उस वक़्त किसी जल्लाद से कम नही लग रहे थे। उन्होंने अपने हॉस्पिटल में इलाज कि सुविधा नही होने,, वेंटिलेटर नही होने का हवाला देकर खून से लतपत अजित को बिना आक्सीजन मास्क लगाए एम्बुलेंस में लोड करवा दिया, और हजारीबाग रेफर कर दिया। इसके तुरंत बाद घायल के परिजनों से सूचना मिलती है कि अजित ने बीच रास्ते मे दम तोड़ दिया। उसके परिजनों ने यह भी बताया कि जब वे हजारीबाग सदर अस्पताल पहुँचे तो डॉक्टरों ने बोला कि जहां से रेफर किया गया है, यदि वहाँ अजित का प्राथमिक उपचार किया जाता तो इसकी मृत्यु नही होती। कल के इस घटना से यह पता चला कि जिस जिला के किसानों की जमीन से कोयला निकालकर देश को रौशन किया जा रहा है, वहाँ जिला के अस्पतालों में घायलों के प्राथमिक उपचार की भी व्यवस्था नही है। जिस जिला के किसानों के जमीन से कोयला का रॉयल्टी का फण्ड विस्थापित- प्रभावित के मूलभूत सुविधाओं को मुहैया कराने के नाम पर कॉल कंपनियां जिला प्रशासन को दे रहीं हैं आखिर जिला प्रशासन उस फण्ड का कहाँ बंदरबाँट कर रहा है??? आखिर क्यों जिले और प्रखंड की सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों को जिला प्रशासन एक वेंटिलेटर कि भी व्यवस्था नही दे पाया है??? इन्ही प्रश्नों के साथ जब हमने चतरा के माननीय सांसद काली सिंह जी को फोन किया तो उन्होंने भी स्पष्ट कह दिया, कि जब चतरा जिला अस्पताल में ही वेंटिलेटर औऱ प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नही है तो टंडवा सिमरिया में कैसे संभव है। माननीय ने भी झारखंड सरकार और स्वास्थ्य मंत्री पर सारा पलड़ा झार दिया। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि जब मूलभूत चिकित्सा व्यवस्था को भी जिला प्रशासन या सरकार दुरुस्त नही कर सकती है तो फिर क्यों और कैसे सभी मिलकर पब्लिक मार्ग पर कॉल ट्रांसपोटिंग के हजारों – हजार वाहनों के परिचालन का एनओसी दे सकती है???? आखिर क्यों बिना बैकल्पिक मार्ग बनाये 10 वर्षो से पब्लिक सड़क पर कोयले का ट्रांसपोटिंग करवाया जा रहा है? चतरा जिले के स्थानीय निवासियों के जीवन के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार आखिर किस कानून ने जिलाधिकारियों को दिया है?? हुकुनामो और दिल्ली राँची में बैठे आकाओं की जी हजूरी करने में मशगूल इन सवालों पर जिला प्रशासन क्यो मौन है?? आखिर क्यों पक्ष -विपक्ष की राजनैतिक पार्टियां कोल परियोजनाओं से विस्थापित- प्रभावित परिवार जन को मुलभुत सुविधा मुहैया कराने के बजाए एक दूसरे पर पासिंग बॉल खेल रही हैं? ऐसे में आमजनमानस किसके पास गुहार लेकर जाए। कैसे बेलगाम कोल वाहनों से एक्सीडेंट में घायल सदस्य को बचाएं, फाइल रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि जब आमजनमानस सड़क पर बैठकर अपने जीवन के अधिकार के लिए आंदोलन करते हैं, तब यही मौन बैठे जिलाधिकारी महज 2 घंटे में वार्ता करने चले आते हैं, और केंद्रीय कोयला आपूर्ति का हवाला देकर आमजनमानस के अधिकारियों को कुचलते हुए, वार्ता में जो आंदोलकारी जिलाधिकारीयों की बात नही मानते हैं तो वे सरकारी कार्य मे बाधा डालने का आरोप लगाकर उनपर मुक़दमा दायर कर देते हैं।

बहरहाल कोल परियोजना संचालित होने के बाद सड़क दुर्घटनाओं में अबतक सैंकड़ों लोगों का अकस्मात मौत और हजारों घायल होने वाले परिवारों को चंद रुपया मुआवजा दिलवाकर मामले को दबा दिया जाता है। इन विसंगतियों को दूर करने पर पिछले एक दशक से सिर्फ तारिक और आस्वासन ही मिला है। लोगों के मांगों पर पहल करने और न्याय की मांग पर प्रशासन और सक्षम प्रतिनिधि कितना तत्पर रहे हैं ये लोगों के सामने है। पिछले हीं दिनों 22/02/2025 को आम्रपाली परियोजना से विस्थापित गांव कुमरांग कला के दो युवकों की हुई दर्दनाक मौत और लगभग 30 घंटे सड़क जाम के बाद बनी सहमति भी अब खोखली नजर आ रही है। जिसमे सिमरिया के माननीय विधायक उज्जवल दास की अध्यक्षता में हुई वार्ता के दौरान 2 जून 2025 को उपायुक्त सभागार में कोल ट्रांसपोटिंग की नियमावली बनाने की लिखित घोषणा की गई थी। लेकिन जब माननीय विधायक महोदय से हमने इस संदर्भ में बात करने के लिए कॉल किया तो उन्होंने फोन अपने पीए को पकड़ा दिया।
स्थानिय लोगों से ये भी जानकारी है कि सभी के मौन होने का कारण सिर्फ मोटे रकम की लाइजनिंग है, जो छूटवेहया नेता, मंत्री, विधायक, सांसद से लेकर बड़े बड़े अधिकारियों तक हर महीने कोल ट्रांसपोटिंग कंपनिया पहुँचा रही हैं। इसलिए जनमानस का कहना है कि पत्रकार कितना भी लिखे कोई सुधार होने वाला नही है। बहरहाल वर्तमान में चतरा जिला की नवनयुक्त डीसी महोदया इस मामले को कितनी गंभीरता से देखती हैं यह आने वाला वक़्त बताएगा। लेकिन जानकारी यह भी है कि स्थानीय लोगों ने क्षुब्द होकर न्यायालय के सरन में जाने मन बना लिया है और पीआईएल याचिका दायर करने का ठान लिया है।

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झारखंड में संचालित कोल परियोजनाओं में बड़का साहब कि कमीशनखोरी, अनगिनत टेबुल खर्च, फिक्स महीना वसूली, और अब कोयला ट्रांसपोर्टिंग में प्रति टन टना टन वसूली का फरमान से त्राहिमाम कर रहे हैं कोयला ट्रांसपोर्टर व्यवसायिक वर्ग

आम्रपाली – चन्द्रगुप्त क्षेत्र के नये महाप्रबंधक संजीव कुमार ने लिया पदभार बोले परियोजना विस्तार के लिए जमीनों की पड़ती हैं आवश्यकता रैयत बिना किसी झिझक के परियोजना विस्तार के लिए प्रबंधन के साथ रहें खड़ा रैयतो के समस्यायों के समाधान के लिए रहूँगा सदैव तत्पर

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